कानपुर. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के परिसर में विगत दिनों ‘युवा संवाद’ सम्मेलन का गरिमामय आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को भारत की वास्तविक पहचान, उसकी गौरवशाली औद्योगिक विरासत और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल सिद्धांतों से परिचित कराना था।

कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ मुख्य वक्ता डॉ. मनमोहन वैद्य जी (अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ), कानपुर प्रान्त के प्रान्त प्रचारक श्री राम जी, प्रोफेसर वाई. एम. जोशी जी और प्रोफेसर सजन त्रिपाठी जी ने दीप प्रज्वलन कर किया। मुख्य वक्ता का परिचय प्रोफेसर अनुराग त्रिपाठी जी द्वारा दिया गया।
प्रमुख संबोधन के मुख्य अंश:

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अपनी पहचान (स्व-बोध) की अनिवार्यता:
डॉ. मनमोहन वैद्य ने अपने संबोधन में इस बात पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया कि आजादी के बाद भारत ने इंग्लैंड, जापान और इजराइल जैसे देशों की तुलना में धीमी प्रगति की। उन्होंने कहा, “प्रगति के लिए संसाधनों से अधिक महत्वपूर्ण अपनी पहचान (स्व) के प्रति स्पष्टता है। जब तक हम यह नहीं जानेंगे कि हम कौन हैं, तब तक हम अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को सही दिशा नहीं दे पाएंगे।”
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भारत: एक प्राचीन औद्योगिक शक्ति:
ऐतिहासिक तथ्यों को साझा करते हुए डॉ. वैद्य ने प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एंगस मेडिसन के आंकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि वर्ष 1 से 1700 ईस्वी तक विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 33% थी, जो उस समय दुनिया में सर्वाधिक थी। उन्होंने इस धारणा को खंडित किया कि भारत केवल ‘कृषि प्रधान’ था; उन्होंने बताया कि प्राचीन भारत धातु विज्ञान (Metallurgy), वस्त्र और चर्म उद्योग का एक उन्नत वैश्विक केंद्र था, जहाँ ‘गृहलक्ष्मी’ (महिलाएं) कुटीर उद्योगों का आधार थीं।
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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और ‘जड़ों’ से जुड़ाव:
प्रसिद्ध गीत ‘सारे जहाँ से अच्छा’ के उदाहरण के माध्यम से उन्होंने नागरिकों और राष्ट्र के संबंधों की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि हमें देश का ‘बुलबुल’ (जो केवल लाभ के लिए रुकती है) नहीं, बल्कि इसकी ‘जड़ें’ और ‘पौधे’ बनना चाहिए, जो अपनी मिट्टी से अटूट रूप से जुड़े होते हैं।
- सोमनाथ मंदिर और गौरव की पुनर्स्थापना:
डॉ. वैद्य ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए सरदार पटेल, के.एम. मुंशी और महात्मा गांधी के दृष्टिकोण को साझा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल एक मंदिर का निर्माण नहीं, बल्कि भारत के स्वाभिमान की पुनर्स्थापना का प्रयास था।
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वसुधैव कुटुंबकम और हिंदुत्व की व्याख्या:
उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘हिंदुत्व’ कोई संकीर्ण ‘रिलीजन’ नहीं, बल्कि एक व्यापक जीवन दृष्टि है। उन्होंने भारतीय आध्यात्मिकता को विविधता का उत्सव मनाने वाला बताया और कहा कि ‘एकम सद विप्रा बहुदा वदंती’ के कारण ही भारत में ‘ईश-निंदा’ (Blasphemy) जैसी कोई अवधारणा कभी नहीं रही।
छात्रों के साथ सीधा संवाद:
व्याख्यान के पश्चात डॉ. वैद्य ने आईआईटी के छात्रों के साथ एक जीवंत प्रश्नोत्तर सत्र में भाग लिया। छात्रों ने आधुनिक विज्ञान, भारतीय दर्शन और वर्तमान वैश्विक चुनौतियों में भारत की भूमिका पर प्रश्न पूछे, जिनका डॉ. वैद्य ने तार्किक और सारगर्भित उत्तर दिया।

कार्यक्रम में संस्थान के वरिष्ठ संकाय सदस्य, शोधार्थी और भारी संख्या में छात्र उपस्थित रहे। अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
