संत नामदेव

संक्षिप्त परिचय

  • संत नामदेव भारत के सांस्कृतिक इतिहास, विशेष रूप से भक्ति परंपरा, के एक केंद्रीय व्यक्तित्व हैं। वे तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में दक्कन के मराठी भाषी क्षेत्र में एक हिंदू परिवार में जन्मे थे।

  • नामदेव जी का प्रभाव आधुनिक भारत, विशेष रूप से मराठा और उत्तर भारत, के कई क्षेत्रों के समाज जीवन में बड़े पैमाने पर दिखाई देता है, जहां वे क्षेत्रीय विशिष्टता, राष्ट्रीयता व पंथनिरपेक्षता के अद्भुत सामंजस्य का प्रतिनिधित्व करते प्रतीत होते हैं। उनका व्यक्तित्व और समाज में उनका सम्मान इस बात का प्रतीक है कि भारत की धार्मिक परंपराओं के गौरवशाली अतीत को संरक्षित करने में उन्होंने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • संत नामदेव जी का जन्म कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी, विक्रम संवत 1327, अर्थात् 26 अक्तूबर, 1270 को ग्राम नरसी बामनी, जिला परभनी, महाराष्ट्र, में हुआ था।

  • संत नामदेव के पिता का नाम श्री दयाशेठ तथा माता का नाम श्रीमती गोणाई था। संत नामदेव का जन्म एक सूचिक (दर्जी) परिवार में हुआ था। हालांकि, नामदेव का मन व्यवसाय में नहीं लगा। उनका विवाह राजाबाई के साथ हुआ और उन्हें पांच संतानें भी हुईं, परन्तु उनका मन विट्ठल/ विठोबा (भगवान श्रीकृष्ण) की भक्ति में ही लगा रहता था। दिन-रात विठ्ठल-विठ्ठल की रट लगाए रहते थे। धीरे-धीरे स्थिति यह हो गई कि उनकी प्रत्येक श्वास विठोबा के नाम से चलने लगी। बीस वर्ष की आयु में नामदेव की भेंट संत ज्ञानेश्वर से हुई। दरअसल, संत ज्ञानेश्वर स्वयं नामदेव से भेंट करने पंढरपुर आये थे और चंद्रभागा नदी के तट पर उनके भजन को देखकर इतने प्रभावित हुए कि दोनों साथ-साथ ही रहने लगे। दोनों ने मिलकर पूरे देश की यात्रा भी की।

संत नामदेवकालीन परिवेश

उस दौरान मुस्लिम आक्रमणकारी धीरे-धीरे उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ रहे थे। अलाउद्दीन खिलजी के कानों में देवगिरी के यादवों के वैभव की कहानियाँ गूंज रही थी। वह दक्षिण द्वार पर बैठा उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था। उस समय तक उत्तर भारत में खिलजी और तुगलग वंश का आधिपत्य हो चुका था। अलाउद्दीन संपत्ति, राज्य व नारी लोलुप था। सन 1296 में देवगिरी (महाराष्ट्र) पर हमला करके उसने काफी धन, हाथी, घोड़ों पर कब्ज़ा कर लिया था। वर्ष 1306-07 में उसने पुनः देवगिरी पर आक्रमण किया। उसने चित्तौड़ और अन्हलवाडा पर आक्रमण महारानी पद्मिनी और देवलदेवी को प्राप्त करने के लिए किया था।

धीरे-धीरे उसके राज्य का विस्तार दक्षिण तक हो गया। मुहम्मद तुगलक उसके समान विस्तारवादी नहीं था। उसकी मृत्यु के बाद दक्षिण में बहमनी राज्य की स्थापना हुई। ये शासक निरंकुश थे। इनकी धर्मान्धता से तत्कालीन जनता त्रस्त होकर सुख और समृद्धि से वंचित हो रही थी। धर्मान्धता से प्रेरित होकर बलात् मतान्तरण, देवालय व मूर्ति-भंजन प्रारम्भ हो चुका था। अपहरण की आशंका से बाल-विवाह की कुप्रथा शुरू हो गई थी। जजिया कर से बचने के लिए लोग मुसलमान होने लगे थे। ऐसे समय में संत नामदेव और संत ज्ञानेश्वर ने वारकरी सम्प्रदाय के माध्यम से समाज को नवजीवन व नई ऊर्जा देने का प्रयास किया। उन्होंने ईश्वर भक्ति को सभी जाति, वर्ग, धर्म व सम्प्रदाय के लिए उन्मुक्त कर दिया था। उन्होंने नाम-संकीर्तन पर बल देकर भक्ति को सर्व-सुलभ बनाया तथा दीन-हीन जातियों के निर्बल हिन्दुओं को संगठित करके उनमें चेतना जगाने का कार्य किया। इसमें सभी जाति और वर्ग के लोग समान रूप से भक्ति के अधिकारी थे।

गुरु की प्राप्ति

संत नामदेव परमेश्वर के सगुण स्वरुप विठ्ठल के उपासक थे, जबकि ज्ञानेश्वर जी निर्गुण के उपासक थे। नामदेव जी के लिए पंढरपुर को छोडकर जाना मृत्यु के समान प्रतीत होता था; परंतु ज्ञानेश्वरजी के विशेष आग्रह पर वे संतों की मण्डली में चल पड़े। मार्ग में मण्डली एक जगह रुकी। सत्संग के पश्चात् संत मंडली ने संत गोरा कुम्हार जी से आग्रह किया कि वे सबको मटके की भांति परखकर पक्का अथवा कच्चा बताएं। संत गोरा कुम्हार जी ने एक लकड़ी (थपकनी) से सबके सिर बजाकर देखे। इस प्रक्रिया में सब संत शांत रहे, किन्तु संत नामदेव रो पड़े। इस बात पर अन्य संत हंस पड़े। इससे नामदेव जी बड़े आहत हुए और उन्होंने विट्ठल का स्मरण किया और भगवान ने उनको गुरु धारण करने के लिए कहा, तो वह कहने लगे कि “जब मुझे आपके दर्शन ही हो गए तो मुझे गुरु की क्या आवश्यकता है?” भगवान ने कहा, ‘‘नामदेव जब तक तू गुरु धारण नहीं करता, तब तक तू मेरे वास्तविक स्वरुप को नहीं पहचान सकता”। भगवान ने उन्हें संत विसोबा खेचर के पास जाने को कहा, जो ज्ञानेश्वरजी के शिष्य थे।

संत ज्ञानेश्वर ने भी कहा, नामदेव! अब आप विसोबा खेचर को अपना गुरु बना लो। संत ज्ञानेश्वर की बात मानकर नामदेव, संत विसोबा की खोज में निकल पड़े। पढंरपुरसे 50 कोस दूर औढियानागनाथ गांव में जाकर उन्होंने संत विसोबा के घर की पूछ-ताछ की। अपने एक पद में नामदेव जी कहते हैं-

मन मेरो सुई तनो मेरा धागा।

खेचर जी के चरण पर नामा सिंपी लागा॥

(अर्थ :  मेरा मन सुई की भांति है और तन रूपी शरीर धागे के समान है, जिसमें गुरु विसोबा खेचर जी के चरणों में नामदेव जी का मन रम गया है। अर्थात् नामदेव, जो सिंपी जाति के थे, उन्होंने अपना गुरु विसोबा खेचर जी को बनाया।)

अंतत: संत विसोबा ने उनको शिष्य के रूप में स्वीकार किया तथा सर्वव्यापी परमेश्वर का ज्ञान करवाया। संत विसोबा खेचर के शिष्य बनने से पूर्व तक वे सगुणोपासक थे। शिष्य बनने के उपरांत उनकी विठ्ठल भक्ति सर्वव्यापक हो गई। संत विसोबा ने नामदेव से कहा – जाओ ‘दुनिया को भगवन्नाम से भर दो।’

पंजाब का प्रवास

देशभर की तीर्थयात्रा के पश्चात् संत नामदेव पंजाब आ गए और यहीं भागवत धर्म का प्रचार करते रहे। वे करताल और एकतारा बजाकर मधुर स्वर में भजन गाते थे। वे बीस वर्षों तक पंजाब में रहे तथा वहीँ उनकी मृत्यु हुई। पंजाब के घुमाण नामक स्थान पर बाबा नामदेव के नाम पर एक गुरुद्वारा आज भी है। इनके शिष्यों को ‘नामदेवियाँ’ कहा जाता है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में उनके 61 पद, 3 श्लोक, 18 रागों में संकलित हैं।

सामाजिक समरसता के अग्रदूत संत नामदेव जी

  • संत नामदेव भारतीय भक्ति परंपरा के महान संतों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने समाज में जाति, धर्म और वर्ग के भेद को मिटाने का कार्य किया और अपने जीवन और आचरण से सामाजिक समरसता का संदेश दिया। उनके जीवन और शिक्षाएं आज भी समाज को एकजुट करने का महत्वपूर्ण साधन हैं।
  • पंजाब की संत परम्परा में नामदेव जी प्रथम संत कहे जाते हैं। पंढरपुर में विट्ठल मन्दिर के प्रवेश द्वार की प्रथम सीढ़ी नामदेव जी की पायरी के नाम से प्रसिद्ध है। संत-नामदेव ने पंजाब में श्री गुरु नानकदेव जी से लगभग दो सौ वर्ष पहले निर्गुण उपासना का प्रतिपादन किया। उत्तर भारत में भक्ति-भाव की संत परम्परा वाले वे आदिपुरुष दिखते हैं। उनकी दृष्टि बहुत व्यापक है और वे कहते हैं कि सभी प्राणियों के अन्दर एक ही राम हैं –

एकल माटी कुंजर चींटी भाजन हैं बहु नाना रे॥

असथावर जंगम कीट पतंगम घटि घटि रामु समाना रे॥

एकल चिंता राखु अनंता अउर तजह सभ आसा रे॥

प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुरु को दासा रे॥

(श्री गुरु ग्रन्थ साहिब)

अर्थात् ‘हाथी और चींटी दोनों एक ही मिट्टी से वैसे ही बने हैं जैसे (एक ही मिट्टी के) बर्तन अनेक प्रकार के होते हैं। एक स्थान पर स्थित पेड़ों में, दो पैरों पर चलने वालों में तथा कीड़े-पतंगों के घट-घट में वह प्रभु ही समाया है। उस एक अनन्त प्रभु पर ही आशा लगाए रखो तथा अन्य सभी आशाओं का त्याग कर दो। नामदेव विनती करता है कि ‘हे प्रभु! अब मैं निष्काम हो गया हूँ इसलिए अब मेरे लिए न तो कोई मालिक है और न कोई दास है अर्थात् स्वामी और दास अब एक रूप हो गए हैं’।

संत नामदेव जातिपाँति का पूर्णतया निषेध करते हैं तथा भक्तिभाव का जागरण करते हुए राम का नाम भजने को ही कहते हैं –

कहा करउ जाती कहा करउ पाति ॥ राम को नामु जपउ दिन राति॥

रांगनि रांगउ सीवनि सीवउ ॥ राम नाम बिनु घरीअ न जीवउ॥

 (श्री गुरु ग्रन्थ साहिब)

अर्थात् ‘मुझे अब किसी ऊँची-नीची जाति-पांति की परवाह नहीं रही क्योंकि, अब मैं दिन-रात परमात्मा का सुमिरन करता हूँ। अब मैं रंगाई और सिलाई का काम किए चला जा रहा हूँ, परन्तु प्रभु-नाम के बिना घड़ी भर भी जीवित नहीं रह सकता’। संत नामदेव, सामाजिक कुरीतियों एवं जातिगत भेदभाव के विरुद्ध हैं, प्रभु स्मरण को ही वे जीवन का आधार मानते हैं। राम का स्नेह ही सब कुछ है। वे कहते हैं ‘अरे मन! क्यों भटक रहा है? –

काहे रे मन भूला फिरई।

चेतनि राम चरन चित धरई॥टेक॥

नरहरि नरहरि जपि रे जियरा। अवधि काल दिन आवै नियरा।

पुत्र कलित्र (स्त्री) धन चित्त विसासा। छाड़ि मनां रे झूठी आसा॥

संत नामदेव, भक्तों को भाई कह कर सम्बोधित करते हैं और राम नाम की महिमा भी बताते हैं। राम नाम के समक्ष सारे जप-तप, यज्ञ, हवन, जोग, तीरथ, व्रत आदि तुच्छ हैं। राम नाम से इनकी तुलना नहीं की जा सकती –

भइया कोई तुलै रे रामाँय नाम।

जोग यज्ञ तप होम नेम व्रत। ए सब कौंने काम॥

संत नामदेव को कुछ लोग निर्गुण उपासक मानते हैं, किन्तु उनका तीर्थों में विश्वास भी कम नहीं है।

त्रिवेणी पिराग करौ मन मंजन।

सेवौ राजा राम निरंजन॥

संत नामदेव आरम्भ में सगुण-भक्ति वाले संत कहे जाते थे, किन्तु आगे चलकर सगुण एवं निर्गुण के मध्य की धारा प्रवाहित करने वाले संत के रूप में वे स्थापित हो गए। श्री कृष्ण के सुन्दर सगुण स्वरूप का वर्णन वे अपने भजन में करते हैं:

धनि-धनि ओ राम बेन बाजै। मधुर मधर धनि अनहत गाजै॥

धनि-धनि मेघा रोमावली। धनि-धनि क्रिसन ओढ़ें कांबली॥

धनि-धनि तू माता देवकी। जिह ग्रिह रमईआ कवलापती॥

धनि-धनि बनखण्ड बिंद्राबना। जह खेलै सी नाराइना॥

बेनु बजावै गोधनु चरै। नामे का सुआमी आनन्द करै॥

(श्री गुरु ग्रन्थ साहिब)

अर्थात् ‘नामदेव कृष्ण के द्वारा मधुर स्वर से बजने वाली वंशी को धन्य कहते हैं। उससे प्रकट होने वाली अनहद धुन भी मधुर है। वह भेड़ भी धन्य है जिसकी रोमावली (बालों) से कमली (कम्बल) बनी है, जिसे कृष्ण ओढ़े हुए हैं। देवकी माता! तू धन्य है, तेरे घर स्वयं कमलापति (भगवान् विष्णु) अवतरित हुए हैं। वृन्दावन के वे जंगल भी धन्य हैं जहाँ भगवान् श्री कृष्ण (नारायण) खेले हैं। संत नामदेव का ईश्वर वंशी बजाता है, गाय चराता है और आनन्द करता है’।

आगे चलकर श्री गुरु नानकदेव जी ने पंजाब की धरती पर जो उपदेश दिया उसका महत्वपूर्ण अंश संत नामदेव के विचार-दर्शन से ही आता है। श्री गुरु नानक देव से दो सौ वर्ष पूर्व, संत नामदेव ने पंजाब में सिक्ख-गुरुओं के भक्ति-जागरण हेतु सामाजिक समन्वय की व्यापक भूमिका तैयार कर दी थी। देश भर में उनके लाखों अनुयायी हैं तथा वे अपने नाम के आगे नामदेव लगाते हैं। संत नामदेव ने मराठी में अभंग तथा हिन्दी में पदों की रचना की। संत कबीर तथा संत रैदास आदि सभी ने इनकी महिमा का गान किया है। भक्त रैदास कहते हैं:

नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरे।

कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरि जीउ ते सभै सरै॥

(श्री गुरु ग्रन्थ साहिब)

अर्थात्  नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, साधना ,सैन आदि सभी पार उतर गए हैं। रविदास कहते हैं कि संतजनों ध्यान से सुन लो कि वह प्रभु सब कुछ कर सकता है। संत नामदेव उस ब्रह्मा की साधना में लगे रहे जो घट-घट वासी है।

सामाजिक समरसता की दृष्टि से उनके कुछ अन्य पद इस प्रकार हैं –

अभिअंतरि राता रहै, ऊपरि रहै उदास। नांम कहै मैं पाईया, भाव भगति बिसवास॥

ढिग ढिग ढूंढे अंध ज्यूं, चीन्है नांही संत। नांम कहै क्यू पाइये, बिन भगता भगवंत॥

(अर्थ – नामदेव जी भाव, भक्ति और विश्वास पर बल देते हुए कह रहे हैं कि जिस प्रकार व्यक्ति के आंतरिक मन में अन्धकार छाया रहता है और उपरी मन में इसी कारण उदासी बनी रहती है इसे दूर करने के लिए भाव, भक्ति और विश्वास जरूरी है। जिस प्रकार स्थान-स्थान पर संतों को ढूंढने पर भी वह दिखाई नहीं  देते क्योंकि भक्ति और भाव के बिना यह कार्य पूरा नहीं हो सकता है।)

हमारे करता राम सनेही। काहे रे नर गरब करत हो।

बिनस जायगी देही। खिनखिन नीव दिवाई।

हरि नाम हीरा हरि नाम हीरा।

हरि नाम लेत मिटें सब पीरा॥ टेक॥

हरि नाम जाती हरि नाम पाती।

हरि नाम सकल जीवन में कांती॥ (138, राग-टोडी)

( अर्थ – हमारे जीवन के कर्ता राम हैं तो तुम किस बात का अहंकार करते हो हमारे करता राम सनेही हैं।  एक दिन तो सभी की देह का अवसान निश्चित है फिर क्यों इतना गुमान करना। ईश्वर का हरि नाम हीरा के समान है जिसका नाम लेने मात्र से सभी तरह का दुख समाप्त हो जाता है। हरि नाम सम्पूर्ण जीवन में प्रकाश की भांति है।)

राम नाम बिनु जीवनु मन हीना।

गिआन अंजन मो कउ गुरि दीना॥ टेक॥

( अर्थ – राम के बिना जीवन व्यर्थ है, मुझे गुरु ने ज्ञान रुपी प्रकाश प्रदान किया है।)

सफल जनमु मो कउ गुर कीना।

दुख बिसारि सुख अंतरि लीना॥

नामदेउ सिमरनु करि जानां।

जगजीवन सिउ जीउ समानां॥ (पद 200, राग बिलावल)

(गुरुजी ने दुख को दूर करके सुख का प्रकाश प्रदान किया है, जिससे मेरा जीवन सफल हो गया है। नामदेव जी को यह बात नाम जप की महिमा से पता चली कि जग का जो जीवन है अर्थात् जो संसार है वह जीव के कल्याण के लिए है।)

संत नामदेव : उत्तर भारत का कार्य

  • महाराष्ट्र में भागवत धर्म वारकरी सम्प्रदाय के प्रवर्तक संत ज्ञानेश्वर जी माने जाते हैं, पर देशभर में इस सम्प्रदाय का प्रचार करने का श्रेय नामदेव जी को ही जाता है।
  • नामदेवजी ने केवल हिंदी-मराठी में कविता ही नहीं की, बल्कि उन्होंने अपने समय में और भी मूल्यवान कार्य किये। ज्ञानेश्वरजी की समाधि लेने के पश्चात नामदेव जी 54 वर्ष जीवित रहे। इस अवधि में उन्होंने भागवत धर्म वारकरी सम्प्रदाय का दक्षिण से उत्तर तक प्रचार किया। नामदेव जी ने कई बार उत्तर भारत की यात्रा की।
  • उनके जीवनकाल में वर्तमान महाराष्ट्र के देवगिरी तक मुसलमानों का राज्य फैल चुका था। उत्तर भारत में तो उनका एकछत्र अधिकार हो चुका था। जनता भयभीत थी। ऐसे समय में नामदेवजी ने पंढरपुर के वारकरी सम्प्रदाय की पताका उत्तर भारत में फहराई। नामदेव जी गोकुल, मथुरा, वृन्दावन होते हुए दिल्ली आए।
  • वृन्दावन में विष्णुस्वामी नाम के एक ब्राह्मण से उनकी मुलाकात हुई। संत नामदेवजी की कथा सुनकर वे उनके शिष्य बन गए। भक्तमाल में नाभादास जी ने संत नामदेवजी के बाद 49 वें आचार्य के रूप में विष्णुस्वामी का उल्लेख किया है।
  • विष्णुस्वामी सम्प्रदाय में भी संत नामदेवजी का स्थान महाराष्ट्र के वारकरी सम्प्रदाय की तरह उच्च माना गया है।
  • संत नामदेवजी उत्तर भारत में कुछ साल रहकर वारकरी सम्प्रदाय के तत्वों का प्रचार और प्रसार करते रहे। शरीर थकने और अधिक उम्र हो जाने के कारण नामदेवजी विट्ठल भगवान् के चरणों में रहने की इच्छा से पंढरपुर वापस आ गए।

संत नामदेव के मुस्लिम संबंधी पद

संत नामदेव के कुछ पदों में बादशाह, बिसमिल, काजी-मुल्ला, सुलतान, मुसलमान, मस्जिद, निमाज, बकरी, मुरगी, हलाल और दोजख इत्यादि शब्दों का उल्लेख मिलता है:

सुलतानु पूछै सुनु बे नामा। देखउ राम तुमारे कामा॥1॥

नामा सुलताने बांथिला। देखउ तेरा हरि बीठुला॥ रहाउ॥

बिसमिलि गऊ देहु जीवाई। ना तरू गरदनि मारउ ठाइ॥2॥

बादसाह ऐसी किड होइ। बिसमिल कीआ न जीवै कोइ॥3॥

मेरा कीया कछू न होइ। करि है रामु होइ है सोइ॥4॥

बादिसाहु चडिओ अहंकारि। गज-हसती दिनों चमकारी॥5॥

रुदनु करै नामे की माई। छोडि राम की न भजहि खुदाइ॥6॥

न हउ तेरा पूंगडा ना तू मेरी माइ। पिंडु पडै तउ हरि गुन गाइ॥7॥

करै गजिंदु सुंड की चोट। नाम उबरै हरि की ओट ॥8॥

काजी मुलां करहि सलामु। इनि हिंदू में राम लिया मानु॥9॥

बादिसाह बेनती सुनेहु। नामे सरभरि सोना लेहु ॥10॥

माउ लेउ तउ दोजकि परउ। दीनु छोडि दुनीआ कउ भरउ ॥11॥

पावहु बेडी हाथहु ताल। नाम गावै गुन गोपाल ॥12॥

गंग जमुन जउ उलटी वहै। तउ नामा हरि करता रहै ॥13॥

सात घड़ी जब बीती सुणी। अजहु न आइओं त्रिभवण धणी ॥14॥

पाखंतण बाज बजाइला। गरूड चढ़े गोविन्द आइला ॥15॥

अपने भगत परि की प्रतिपाल। गरूड चढ़े आए गोपाल ॥16॥

कहहित धरणी इकोडी करउ। कहहि त लेकरि उपरि धरुं ॥17॥

कहहि त मुई गऊ देरु जीआइ। सभु कोइ देखे पती आइ ॥18॥

नामा प्रणवै सेलमसेली। गउ दुहाइ बछरा मेलि ॥19॥

दुधहि दुहि जब मटकी भरी। ले बादिसाह के आगे धरी ॥20॥

बादिसाहु महलमहि जाइ। अउघट की घटलागी आइ ॥21॥

काजी मूला बिनती फुरमाइ। वखसी हिंदु मैं तेरी गाइ ॥22॥

नामा कहे सुनहु बादिसाह। इहु किछु पतीआ मुझै दिखाइ ॥23॥

इस पतीआका इहै परबानु। साचि सील चालहु सुलितानु ॥24॥

नामदेऊ सभ एहिआ समाइ। मिलि हिंदु सम नामे पहि जाहि ॥25॥

जउ अबकी बार न जीवै गाइ। त नामदेव का पतीआ जाइ ॥26॥

नामे की कीरति रही संसारि। भगत जना ले उधरिआ पारी ॥27॥

सगल कलेश निंदक भइआ खेदु। नामे नाराइन नाही भेदु ॥28॥

(संत नामदेव तथा उनका हिंदी साहित्य, लेखक कृ. गो. वानखड़े गुरुजी, पद 47, राग-भैरउ)

मुसलमीन तो हंबी जाणी। नहीं रामकु तोली॥

पांच बखत नीमाजु गुजरी। मस्जिद क्यूं नहीं बोली॥

नामा तू हि बकरी काटी। मृगी काटी हलाल कीया कहता है॥

मुरगी में सो अंडा निकला। हलाल कैसा होता है॥

नामा तू हि झूठा रे॥

उन ने मारा उन ने तारा। उनने किया उत्थारा॥

मुवा पोगंडा आब जिवावै। ऐसा राम हमारा पाच्छा॥

(संत नामदेव तथा उनका हिंदी साहित्य, लेखक कृ. गो. वानखड़े गुरुजी, पद, 80)

शिष्य तथा संप्रदाय

उनके समय में नाथ और महानुभाव संप्रदाय का महाराष्ट्र में प्रचार था। इनके अतिरिक्त महाराष्ट्र में पंढरपुर के ‘विठोबा’ की उपासना भी प्रचलित थी। इसी उपासना को दृढता से चलाने के लिए संत ज्ञानेश्वर ने सभी संतों को एकत्रित कर ‘वारकरी संप्रदाय’ की नींव डाली। सामान्य जनता प्रति वर्ष आषाढ़ और कार्तिक एकादशी को विठ्ठल दर्शन के लिए पंढरपुर की ‘वारी’ (यात्रा) किया करती है। यह प्रथा आज भी प्रचलित है। इस प्रकार की वारी (यात्रा) करनेवालों को ‘वारकरी’ कहते हैं। विठ्ठलोपासना का यह ‘संप्रदाय’ ‘वारकरी’ संप्रदाय कहलाता है। नामदेव इसी संप्रदाय के एक प्रमुख संत माने जाते हैं। आज भी इनके रचित अभंग पूरे महाराष्ट्र में भक्ति और प्रीति के साथ गाए जाते हैं। महाराष्ट्र में उनके प्रसिद्ध शिष्य हैं, संत जनाबाई, संत विष्णुस्वामी, संत परिसा भागवत, संत चोखामेला, त्रिलोचन आदि। उन्होंने इनको नाम-ज्ञान की दीक्षा दी थी। इस धरती पर जीवों के रूपमें विचरने वाले विठ्ठल की सेवा ही सच्ची परमात्मसेवा है।

समाधि

संत नामदेव की समाधि अथवा देह त्याग को लेकर दो मत हैं। एक मत ​है कि विट्ठल मंदिर के महाद्वार पर उन्होंने समाधि ले ली। 80 वर्ष की आयु तक इस संसार में विट्ठल के नाम का जप करते-कराते पढंरपुर में विठ्ठल के चरणोंमें आषाढ कृष्ण त्रयोदशी संवत 1272 में वह स्वयं भी इस भवसागरसे पार चले गए। दूसरा मत है कि देश भर की तीर्थयात्रा के पश्चात् संत नामदेव पंजाब आ गए और दो दशकों तक वहाँ भागवत धर्म का प्रचार करते रहे और वहीं घुमाणा में उन्होंने देह त्याग किया। वास्तव में नामदेवजी का जीवन और उनकी वाणी भक्ति अमृत का वह निरंतर बहता हुआ झरना है, जिसमें हिन्दू धर्म का सहज अनुपालन करते मानवता को पवित्रता प्रदान करने की अद्भुत सामर्थ्य है।

संत नामदेव जी ने महान धर्म प्रचारक की भूमिका निभाई। उनके जीवन का उद्देश्य, देश और समाज में धर्म के नाम पर प्रचलित रुढियों को समाप्त करना था। उनकी भाषा जनता की भाषा थी। वे मराठी और हिंदी में समान भाव से पद रचना करने में समर्थ थे। यह उनकी विद्वता का परिचायक है। सारे देश में उनके लाखों अनुयायियों की उपस्थिति उनकी जनप्रियता का प्रमाण है। भारत के कोने-कोने में घूमकर उन्होंने अनंत विचारधाराओं से संपर्क स्थापित किया। उन्होंने अपनी प्रखर बुद्धि एवं तात्विक विचारधारा से समाज में व्याप्त दोषों पर कटुसत्य भाषा में प्रहार किया और वारकरी पंथ के नाम से नवीन पंथ का सूत्रपात किया। महाराष्ट्र एवं उसके पड़ोसी प्रान्तों की जनता का यह पंथ आज भी श्रद्धापात्र है।

संदर्भ ग्रन्थ

  1. स. गोविन्द रजनीश, नामदेव रचनावली, अमरसत्य प्रकाशन, प्रीत विहार, दिल्लीप्रथम संस्करण, 2003
  2. माधव गोपाल देशमुख, भारतीय साहित्य के निर्माता नामदेव, साहित्य अकादमी, नई दिल्लीद्वितीय संस्करण 1990
  3. कृ. गो. वानखड़े गुरुजी, संत नामदेव, प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकारपुनर्मुद्रण 2012
  4. डॉ. रामचंद्र मिश्र, संत नामदेव और हिंदी पद-साहित्य, शैलेन्द्र साहित्य सदन, फर्रुखाबाद(उत्तर प्रदेश), प्रथम संस्करण 1969
  5. डॉ. हेमंत विष्णु इनामदार एवं श्री जयंत तिलक, संत नामदेव, केसरी मुद्रणालय, पुणे

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