सार्वभौमिक एकात्मता समारोह, मैडिसन स्क्वायर गार्डन, पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के उद्बोधन के प्रमुख बिंदु

न्यूयॉर्क | 30 अगस्त 2026

बहुलतावाद और विविधता में एकता

जब हम संयुक्त राज्य अमेरिका कहते हैं, तब एक शब्द जिसकी प्रायः चर्चा होती है, वह है—“बहुलतावाद” (Pluralism)। और जब हम भारत कहते हैं, तब एक अन्य शब्द, एक अन्य भाव-वाक्य सामने आता है—“विविधता में एकता” (Unity in diversity)। भारत के लिए एकता और विविधता—दोनों उसके स्वभाव में ही अन्तर्निहित हैं।

राष्ट्र का ध्येय और दायित्व

राष्ट्र केवल भौगोलिक इकाइयाँ नहीं होते। राष्ट्र एक दायित्व का निर्वाह करते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि प्रत्येक राष्ट्र के पास संसार को देने के लिए एक संदेश, पूर्ण करने के लिए एक ध्येय और साकार करने के लिए एक नियति होती है।

भारत की नियति

भारत को कौन-सी नियति प्राप्त हुई है? भारत का दायित्व है कि वह विविधता में एकता के इस सत्य का साक्षात्कार करे और समय-समय पर संसार को भी इस सत्य का साक्षात्कार कराए।

हम एक हैं और विविधता के कारण हमारी यह एकता और भी सुशोभित होती है। अतः विविधता का उत्सव मनाया जाना चाहिए, उसका सम्मान किया जाना चाहिए और उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। साथ ही, हमें अपने भीतर एकात्मता के इस भाव को सदैव बनाए रखना चाहिए।

मानव का वैश्विक दायित्व

जो विचारशील मनुष्य उचित और अनुचित का ज्ञान रखते हैं, उनका दायित्व है कि वे सम्पूर्ण विश्व को धारण और संरक्षित रखने में अपना उत्तरदायित्व निभाएँ।

विचार की दिशा

यदि आप सम्यक् प्रकार से विचार करते हैं, तो आप ईश्वर के निकट जा सकते हैं। यदि आप अनुचित ढंग से विचार करते हैं, तो आप पशु-जगत के निकट जा सकते हैं। अतः दिशा महत्त्वपूर्ण है।

उत्तरदायी नागरिक

जो व्यक्ति अपने जीवन को उचित दिशा के अनुसार ढालता है, वह ईश्वर के राज्य का उत्तरदायी नागरिक बन जाता है।

मनुष्य की विशिष्टता — विचार

एक ऐसी विशेषता जो मनुष्य को पशुओं से भिन्न बनाती है, वह है—विचार करने की क्षमता। यदि मनुष्य सम्यक् विचार करे, तो वह सम्पूर्ण विश्व को धारण कर सकता है।

उचित-अनुचित का विवेक और एकता

मनुष्य विश्व के प्रति उत्तरदायी है, क्योंकि उसमें उचित और अनुचित का विवेक है। इसलिए मनुष्य विविधता के बावजूद एकता का साक्षात्कार कर सकता है।

अन्तर्निहित एकत्व

हमारे शरीर भिन्न हैं और बाह्य रूप से सब कुछ अलग दिखाई देता है, फिर भी हमारे भीतर कुछ ऐसा है जो समान है। हम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं; हम परस्पर के हैं।

अस्तित्व की एकता

“अस्तित्व की एकता” — यही हमारा सत्य है।

विश्व-दृष्टि

संसार को “एक” देखना हमारी दृष्टि है।

दो जीवन-दृष्टियाँ

एक प्रवृत्ति थी—“जियो और जीने दो।”

दूसरी प्रवृत्ति थी—“जियो और केवल उन्हीं को जीने दो जो हमारी आज्ञा मानें।”

जो कहते हैं—“तुम हमारी आज्ञा मानो और हम तुम्हारी रक्षा करेंगे,” वे राक्षस हैं।

भारत की संत-परम्परा

भारत के सन्त-महापुरुष,  दुष्ट लोगों के मन से शत्रुता का भाव समाप्त हो जाए, ऐसी प्रार्थना करते हैं।

अमेरिका में भारतीय प्रवासी समुदाय का दायित्व

अमेरिका में रहने वाले भारतीय प्रवासी समुदाय को अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए।

इस अनिवार्य कर्तव्य का निर्वाह करने के पश्चात् यदि जन्मभूमि के लिए कुछ करने की उत्कट इच्छा हो, तो उन मूल्यों के अनुरूप जीवन जिएँ जो भारत ने आपको प्रदान किए हैं।

भारत की विश्व-भूमिका

हमारी नियति है कि हम यह संदेश संसार को दें। और जिस दृढ़ आधार पर इस धर्म का बोध होता है, वह है—अस्तित्व की एकात्मता, अस्तित्व की एकता। यही हमारा सत्य है।

हिमालय से समुद्र तक एक दायित्व

हिमालय से समुद्र तक हमारा एक ही दायित्व है—इस ज्ञान को संसार तक पहुँचाना।

भारत में हमारा दायित्व है कि हम सत्य का साक्षात्कार करें।

भारत की जीवन-दृष्टि

भारत ने आपको जीवन की दृष्टि प्रदान की है।

उपदेश नहीं, आचरण

एक भारतीय का दायित्व है कि वह इस संदेश को उपदेश द्वारा नहीं, बल्कि आचरण द्वारा संसार तक पहुँचाए।

धर्म का अर्थ

धर्म वह नियम है जिसके द्वारा सम्पूर्ण सृष्टि धारण होती है।

धर्म वह नियम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने जीवन की गुणवत्ता को सुव्यवस्थित कर सकता है।

मध्यम मार्ग ही धर्म है।

एकात्मता और विविधता

हम एकात्मता में एकजुट हैं और विविधता से सुशोभित हैं।

विविधता स्वाभाविक, एकता सत्य

विविधता स्वाभाविक है और एकता सत्य है।

ग्रहण और प्रतिदान

हमने संसार से सब कुछ ग्रहण किया है, अतः हमें संसार को लौटाना भी है।

हम कितना अर्जित करते हैं, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है; हम कितना बाँटते हैं, यह महत्त्वपूर्ण है।

परम्परा और सतत् जीवन-पद्धति

हमें लौटाकर देना है। यही हमारी परम्परा है।

भारत आपसे अपेक्षा करता है कि आप उसकी जीवन-दृष्टि को आगे बढ़ाएँ।

यह सतत् जीवन-पद्धति का एक आदर्श है।

 

 

 

कार्य आह्वान

 

पाँच संकल्प। एक साझा मानव-परिवार।

आज हम मानवता के लिए एक और अत्यंत निर्णायक क्षण में एकत्रित हुए हैं।

हम उन परम्पराओं से आते हैं जो राष्ट्रों से भी प्राचीन हैं—शास्त्रों, वंश-परम्पराओं और प्रार्थना-पद्धतियों से, जिन्होंने हमारी मानव-जाति द्वारा अनुभव किए गए प्रत्येक उल्लास और प्रत्येक विपत्ति के बीच अरबों मनुष्यों का मार्गदर्शन किया है। हम आस्था की उस असाधारण शक्ति को जानते हैं जो उपचार, मेल-मिलाप और प्रेरणा प्रदान कर सकती है—और उस पीड़ादायक सत्य को भी जानते हैं कि धर्म का कभी-कभी विभाजन करने, बहिष्कृत करने और हिंसा को उचित ठहराने के लिए उपयोग किया गया है। हमें यह दोनों प्रकार की विरासत प्राप्त हुई है और उसके साथ उससे उत्पन्न उत्तरदायित्व भी।

जब हम यहाँ एकत्रित हुए हैं, नगरों पर बमबारी हो रही है और परिवार अपने बच्चों को दफना रहे हैं। जिन पड़ोसियों ने पीढ़ियों तक साथ-साथ प्रार्थना की, वे अब एक-दूसरे से भयभीत हैं। घृणा सीमाओं को पार कर रही है और हमारे परदों के माध्यम से अभूतपूर्व गति से फैल रही है। संस्थाओं पर और एक-दूसरे पर विश्वास कमज़ोर पड़ रहा है, जबकि नई प्रौद्योगिकियाँ यह परिवर्तित कर रही हैं कि मनुष्य किस प्रकार संवाद करते हैं, सत्य को समझते हैं, शक्ति का प्रयोग करते हैं और भविष्य की कल्पना करते हैं।

कोई भी सरकार, संस्था अथवा प्रौद्योगिकी अकेले इस क्षण का उत्तरदायित्व वहन नहीं कर सकती। धार्मिक नेता भी अकेले ऐसा नहीं कर सकते। किंतु एक ऐसा उत्तरदायित्व है जो विशिष्ट रूप से हमारा है।

हमारी विभिन्न परम्पराओं, आस्थाओं, इतिहासों और संस्कृतियों के बीच हम एक मूलभूत सत्य की पुष्टि करते हैं:

प्रत्येक मनुष्य गरिमा-संपन्न है,
कोई भी समुदाय दूसरे से कम मानव नहीं है,
और किसी अन्य का दुःख केवल इसलिए हमारे लिए अप्रासंगिक नहीं हो सकता कि वह हमारा अपना दुःख नहीं है।

एकता के लिए एकरूपता आवश्यक नहीं है। दृढ़ विश्वास के लिए तिरस्कार आवश्यक नहीं है। दूसरे मनुष्य की मानवता की रक्षा करना हमारी अपनी मानवता को कम नहीं करता।

अतः हमारे समक्ष प्रश्न केवल यह नहीं है कि हम क्या मानते हैं। प्रश्न यह है कि हम क्या करने के लिए तत्पर हैं।

हमारे पाँच संकल्प

१. हम स्वयं से आरम्भ करेंगे।

हम सबसे पहले अपने ही समुदायों के शब्दों, शिक्षाओं, संस्थाओं और आचरणों का परीक्षण करेंगे। हम घृणा, अपमान, अमानवीकरण अथवा हिंसा को उचित ठहराने के लिए धर्म के उपयोग को अस्वीकार करेंगे और यह सिखाएँगे कि गहरा विश्वास, भिन्न मत रखने वालों के प्रति सम्मान के साथ सह-अस्तित्व रख सकता है।

शान्ति का आरम्भ अपने ही समुदायों को उत्तरदायी ठहराने के साहस से होता है।

२. हम एक-दूसरे के पक्ष में खड़े होंगे।

जब किसी अन्य समुदाय पर संकट आएगा, तब हम उसे अकेला नहीं छोड़ेंगे। जब किसी मनुष्य को अमानवीय ठहराया जाए अथवा निशाना बनाया जाए, तब हम बोलेंगे—चाहे वह हमारे अपने समुदाय का हो या किसी अन्य समुदाय का, चाहे वह हमारे निकट हो या हमसे दूर।

और जब हममें से कोई व्यक्ति किसी अन्य समुदाय की गरिमा के पक्ष में सिद्धान्तनिष्ठ होकर खड़ा होगा, तब हम उसके साथ खड़े होंगे।

३. आवश्यकता पड़ने से पहले हम सम्बन्धों का निर्माण करेंगे।

हम धार्मिक और सांस्कृतिक सीमाओं के पार अपने समुदायों को—विशेषकर युवाओं को—एक साथ लाएँगे; किसी त्रासदी की प्रतिक्रिया में नहीं, बल्कि उससे पहले।

हम उन लोगों की बात सुनेंगे जिन्हें हमने गलत समझा है और ऐसे अवसर निर्मित करेंगे जहाँ वे लोग, जो अन्यथा एक-दूसरे से केवल अपरिचितों, रूढ़ धारणाओं या प्रतिद्वंद्वियों के रूप में मिलते, एक-दूसरे से मनुष्य के रूप में मिल सकें।

जिस व्यक्ति को हम जानते हैं, उससे घृणा करना कठिन होता है।

४. हम मिलकर सेवा करेंगे।

हम साझा मूल्यों को साझा कार्य में परिणत करेंगे। परम्पराओं और सीमाओं के पार हम वहाँ सेवा करेंगे जहाँ पीड़ा तत्काल उपस्थित है—भूखों के बीच, रोगियों के बीच, विस्थापितों के बीच, उत्पीड़ितों के बीच और उपेक्षितों के बीच।

हम उन साहसिक कार्यों का समर्थन करेंगे जो पहले से चल रहे हैं, न कि मान्यता या श्रेय प्राप्त करने के लिए उनके साथ प्रतिस्पर्धा करेंगे।

हमारा सहयोग केवल उन बातों में दिखाई नहीं देना चाहिए जिन्हें हम साथ मिलकर कहते हैं, बल्कि उन कार्यों में भी दिखाई देना चाहिए जिन्हें हम साथ मिलकर करते हैं।

५. हम भविष्य के प्रति अपना उत्तरदायित्व स्वीकार करेंगे।

जहाँ कहीं मानव-गरिमा दाँव पर हो, वहाँ हम अपने नैतिक प्रभाव का उपयोग करेंगे—युद्ध और शान्ति, निर्धनता और अवसर, हमारी साझा दुनिया की देखभाल तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों से सम्बन्धित निर्णयों में।

हम इस बात पर आग्रह करेंगे कि मानव-प्रगति मानव-जीवन की सेवा में ही बनी रहे और प्रौद्योगिकी मानव-गरिमा, सत्य, स्वतन्त्रता तथा मानवीय सम्बन्धों को सुदृढ़ करे, उनका ह्रास न करे।

वैश्विक घोषणा तभी सार्थक है, जब वह स्थानीय कार्य में परिणत हो।

ये संकल्प इस सभा के समाप्त होते ही समाप्त नहीं होंगे। हम परस्पर जुड़े रहेंगे, नेतृत्व कठिन होने पर एक-दूसरे का सहयोग करेंगे और यहाँ किए गए संकल्पों के प्रति एक-दूसरे को उत्तरदायी बनाए रखेंगे। हममें से प्रत्येक इन संकल्पों को अपने-अपने घर तक लेकर जाएगा।

अतः हम यहाँ एकत्रित प्रत्येक नेता से एक ठोस कार्य करने का आह्वान करते हैं: ऐसे लोगों को एकत्रित करें जो सामान्यतः एक-दूसरे से नहीं मिलते; अपने समुदाय से भिन्न किसी समुदाय के साथ खड़े हों; जहाँ आपका प्रभाव हो वहाँ घृणा का सामना करें; युवाओं के लिए किसी धार्मिक अथवा सांस्कृतिक सीमा को पार करने का अवसर उत्पन्न करें; किसी अन्य समुदाय के साथ मिलकर सेवा करें; अथवा ऐसी बातचीत का आरम्भ करें जिसे बहुत लंबे समय से टाला जाता रहा है।

एक कार्य चुनिए अथवा कोई अन्य कार्य निर्धारित कीजिए किंतु उसे विशिष्ट बनाइए।

उसे एक स्थान, एक उद्देश्य और आगे बढ़ने का एक मार्ग दीजिए। हमें बताइए कि आप क्या करने का निश्चय रखते हैं। फिर हमें यह भी बताइए कि आपने क्या किया।

हम यथार्थ से अनभिज्ञ नहीं हैं। केवल धार्मिक नेता युद्धों को समाप्त नहीं कर सकते, घृणा का उन्मूलन नहीं कर सकते और प्रत्येक अन्याय को उलट नहीं सकते। किंतु हम शक्तिहीन भी नहीं हैं। प्रत्येक धार्मिक नेता किसी समुदाय को प्रभावित करता है। प्रत्येक समुदाय दूसरे समुदाय तक पहुँचता है। प्रत्येक साहसिक कार्य किसी अन्य साहसिक कार्य को सम्भव बनाता है।

एक विश्व। एक मानवता।

इसलिए नहीं कि हम सभी एक जैसे हैं।
इसलिए नहीं कि हम प्रत्येक बात पर सहमत हैं।
बल्कि इसलिए कि हमारी गरिमा साझा है, हमारे भविष्य परस्पर जुड़े हुए हैं और हम अपने पीछे जो संसार छोड़ेंगे, उसका स्वरूप इस बात से निर्धारित होगा कि हम अभी क्या करने का चयन करते हैं।

स्वयं से आरम्भ करते हुए।
एक-दूसरे के पक्ष में खड़े होते हुए।
मिलकर सेवा करते हुए।
भविष्य के प्रति उत्तरदायित्व स्वीकार करते हुए।

यही हमारा कार्य आह्वान है।

“सार्वभौमिक एकात्मता समारोह, मैडिसन स्क्वायर गार्डन, पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के उद्बोधन के प्रमुख बिंदु” पर एक विचार

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *