अपनापन और आत्मीयता ही हिंदुत्व का वास्तविक सार : सुभाष जी

कानपुर। बी. एन. एस. डी. शिक्षा निकेतन इण्टर कॉलेज, कानपुर में बैरिस्तर नरेन्द्रजीत सिंह बाल संस्कार केन्द्र एवं माँ सुशीला नरेन्द्रजीत सिंह सिलाई केन्द्र का 32वाँ वार्षिकोत्सव एवं सहभोज समारोह अत्यंत गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र प्रचार प्रमुख सुभाष जी ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री ब्रह्मावर्त सनातन धर्म महामंडल के अध्यक्ष एवं पूर्व क्षेत्रसंघ चालक वीरेन्द्र पराक्रम आदित्य जी ने की।

अपने उद्बोधन में सुभाष जी ने कहा कि मुझे बताया गया कि इस बार आपको रहना है। स्वाभाविक है, कोई न कोई हर बार रहता ही होगा। मैंने आज प्रबंधकों से पूछा कि यह कितने साल से चल रहा है, तो बताया गया कि यह 32वाँ कार्यक्रम है। मैं विचार कर रहा था कि जो सेवा केंद्र चल रहा है, उसके पीछे आधार क्या है? एक आधार संसाधन हो सकता है, लेकिन संसाधन अवसर देता है, गति देने का काम नहीं करता। गति देने का काम तो संकल्प से होता है। इसलिए जो सेवा केंद्र 32 वर्षों से चल रहा है, यह ‘संकल्प से सिद्धि’ की यात्रा है। यह ‘विचार से संस्कार’ की यात्रा है। यह ‘करुणा से परोपकार’ की यात्रा है। यह ‘सहचर्य से सहजीवन’ की यात्रा है और यह ‘अनुभूति से संस्कृति’ की यात्रा है।

सेवा अनुभूति का विषय है। जब हम अनुभूति करते हैं, उस स्थान पर खड़े होकर अपने को देखते हैं, तो हमें लगता है कि इस काम की आवश्यकता है। इसलिए संघ में हम लोग एक गीत गाते हैं—

सेवा है यज्ञ कुंड, समिधा सम हम जले।
नेह महासागर में, सरित रूप हम मिले॥

हम लोग विचार करते होंगे कि यह यज्ञ क्या है? यज्ञ कर्तव्य है। हमारे जीवन में तीन ऋण हैं और पाँच कर्तव्य हैं, जिन्हें हम पंच यज्ञ बोलते हैं। हमारा जीवन भी यज्ञ के साथ प्रारंभ हुआ है। भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के दसवें श्लोक में लिखा है—

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाच प्रजापतिः।

यज्ञ के साथ हमारा निर्माण हुआ है। प्रजापति ब्रह्मा ने हमारा निर्माण इसलिए किया है कि हम दोनों मिलकर एक-दूसरे का विकास करें; यज्ञ के साथ अपना विकास करें, समष्टि का विकास करें। अर्थात जो हमारे कर्म और कर्तव्य हैं—माता ने जन्म दिया है, पिता ने जन्म दिया है, पूर्वजों की कृपा है, वह ‘पितृ ऋण’ है। देवताओं की कृपा से मुझे यह जीवन मिला है, इसलिए ‘देव ऋण’ भी है। और मुझे लोगों ने ज्ञान दिया है, संस्कार दिए हैं, इसलिए ‘ब्रह्म ऋण’ भी है। इसलिए देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, ब्रह्म यज्ञ, बलिवैश्वदेव यज्ञ और नृ यज्ञ (मनुष्य यज्ञ)—ऐसे पाँच कर्तव्य हमारे समाज में प्रतिदिन हर व्यक्ति को करने रहते थे।

स्वाभाविक है, जब हम रास्ता भटकते हैं और कोई हमें रास्ता बताता है, तो हम उसे धन्यवाद देते हैं। इतना बड़ा जीवन मिला है, जिसके विषय में भगवान ने स्वयं कहा है—’बड़े भाग्य मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ’। सारे ग्रंथों ने इसका वर्णन किया है—’आगम निगम प्रसिद्ध पुराना, सेवा धर्म कठिन जग जाना’। कठिन है, लेकिन इसकी आवश्यकता है; इसको हमें करने की जरूरत है। इसलिए हम अपने जीवन में और अपने समाज के अंदर देखते हैं कि एक यज्ञ का चक्र है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन का भी चक्र है। भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के 14वें और 15वें श्लोक यज्ञ के चक्र का वर्णन करते हैं—

यज्ञाद्भवति पर्जन्यः पर्जन्यादन्नसंभवः।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्॥
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥

गोस्वामी जी ने इसी बात को बहुत सरल शब्दों में कहा है—
आकर चारि लाख चौरासी। जीव जल थल नभ बासी॥
सियाराम मय सब जग जानी। करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी॥

‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।’—संपूर्ण जगत में ईश्वर का वास है। जिन बच्चों को हम संस्कार केंद्र बुला रहे हैं, उनके अंदर भी ईश्वर का वास है; जिन बालिकाओं को हम स्वावलंबन सिखा रहे हैं, उनके अंदर भी ईश्वर है। मैंने अभी पढ़ा कि लगभग 1,250 बालिकाएँ यहाँ से स्वावलंबन के गुण सीखकर निकली हैं और 1,800 बच्चे शिक्षा-संस्कार लेकर यहाँ से गए हैं। 32 वर्षों से यह काम निःशुल्क चल रहा है, लगातार चल रहा है। अभी मैं बैठकर विचार कर रहा था—1994 में यह सेवा का काम प्रारंभ हुआ। मुझे प्रचारक बने 31 वर्ष हो गए, मैं 1995 में प्रचारक निकला था। मेरे प्रचारक जीवन से भी एक साल बड़ा यह सेवा का काम है।

इसकी प्रेरणा क्या है? जिनकी कीर्ति चारों तरफ गूँजती है, उन्हीं की प्रेरणा है। उनकी प्रेरणा लेकर यहाँ की प्रबंध समिति के लोगों ने वीरेंद्र सिंह जी के मार्गदर्शन में यह काम प्रारंभ किया था और आज उनकी तीसरी पीढ़ी इस काम को बढ़ा रही है। इस काम को हमें समझने की आवश्यकता है। यह सनातन का संदेश है—जो हिंदू है, वही सनातन है। परम पूजनीय सरसंघचालक जी से किसी ने पूछा कि ‘यह हिंदुत्व क्या है?’, तो पूजनीय सरसंघचालक जी ने एक शब्द में कहा कि “अपनापन ही हिंदू है।” जो अपनापन है, वही बंधुता है। स्वतंत्रता, समता और बंधुता की बात बाबा साहेब करते थे। ये बुद्ध के विचार हैं, सनातन विचार हैं। जहाँ पर बंधुता है, वहीं पर संवेदना है; जहाँ संवेदना है, वहाँ सहिष्णुता है; जहाँ सहिष्णुता है, वहाँ करुणा है; जहाँ करुणा है, वहाँ परोपकार है; और जहाँ परोपकार है, वहीं पर सेवा है। यही अपनापन है।

बिना अपनेपन के, बिना आत्मीयता के हम किसी के साथ खड़े नहीं हो सकते। अभी 15 दिन पहले की बात है—प्रयागराज में गंगापार जिला है, वहाँ कौड़िहार नाम का एक विकासखंड है, जहाँ से गंगा जी बहती हैं। गंगा स्नान के लिए बहुत लोग गए थे। हमारे स्वयंसेवक सुरेश केसरवानी जी, जो उस खंड के शारीरिक प्रमुख थे, वे भी गए थे। उन्होंने देखा कि गंगा जी की धार में तीन लोग डूब रहे हैं। तीन लोगों को डूबता देखकर उन्होंने एक क्षण का भी विलंब नहीं किया और गंगा जी की धार में कूद गए। दो लोगों को बचाने के लिए उन्होंने धक्का दिया, जिससे वे दोनों किनारे आ गए। तीसरे जो डूब रहे थे, उनकी पत्नी भी वहीं स्नान कर रही थीं; उन्हें बड़ी पीड़ा हुई और वे तुरंत अपने पति को बचाने के लिए कूद गईं। उनके पति तो निकल आए, लेकिन वे गहरी धार में चली गईं। उन्हें बचाने के लिए सुरेश जी आगे बढ़े, तो गहरी धार के चक्रवात में दोनों फँस गए और संसार से चले गए। समाज के लिए उन्होंने अपना जीवन अर्पित कर दिया। डूबने वाले उनके कोई रिश्तेदार नहीं थे, कोई सगे-संबंधी नहीं थे। यह जो अपनापन है, जो बंधुता है—यही हिंदुत्व का सार है और सार का विस्तार है। यही हमारी प्रेरणा है और यही हमें आगे बढ़ने की शिक्षा देता है।

रमण महर्षि से मिलने के लिए एक बार एक पादरी आया। बातचीत करते-करते थोड़ा विलंब हो गया, तो रमण महर्षि ने कहा, “अब मुझे ईश्वर-दर्शन के लिए जाना है।” पादरी ने कहा, “क्या मैं भी आपके साथ चल सकता हूँ?” वे बोले, “यदि आपकी इच्छा हो, तो आप चल सकते हैं।” रमण महर्षि कहाँ जाते हैं? वे सेवा बस्ती के अंदर जाते हैं और कुष्ठ रोगियों को पट्टी बाँधते हैं। बड़ी देर तक वे यही करते रहते हैं। पादरी प्रतीक्षा में था कि कब हमें ईश्वर के दर्शन होंगे, कब वे भगवान के दर्शन के लिए जाएँगे। जब उससे रहा नहीं गया, तो उसने पूछा, “आप भगवान के दर्शन के लिए कब जाएँगे?” रमण महर्षि ने कहा, “मेरे भगवान यही हैं। मैं अभी तक क्या कर रहा था? भगवान का ही दर्शन तो कर रहा था।” यह अपनापन ही हमारी प्रेरणा है।

आज वनवासी कल्याण आश्रम का काम इतना बड़ा है। डाक-तार विभाग में नौकरी करने वाले एक सज्जन जशपुर गए। वहाँ के संकट को देखकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और वनवासियों की सेवा के काम में लग गए। आज भारतवर्ष के अंदर लगभग 10.5 करोड़ की संख्या में वनवासी समाज है और लगभग 750 जनजातियाँ हैं। उन जनजातियों के बीच किसी न किसी रूप में—चाहे बाल संस्कार केंद्र हो, खेलकूद केंद्र हो, छात्रावास हो या विद्यालय हो—जो पौधा 1952 में रोपा गया था, वह आज सबको जोड़ने का काम कर रहा है। यह सब अपनेपन के कारण ही चल रहा है।

बुंदेलखंड के आशीष जी, जो कभी गोरखपुर में प्रचारक थे, अपनापन ही उन्हें खींचकर हरिद्वार ले गया। वहाँ जाकर वे कुष्ठ रोगियों की सेवा में लग गए। आज कितने वर्षों से वे सेवा का काम कर रहे हैं; निरंतर उनका यही काम चल रहा है। यह जो अपनापन है, सबको जोड़कर रखता है। यह अपनापन किसी एक को भी बाहर जाने नहीं देता। यह अपनापन किसी के प्रति हीनता या अहंकार का भाव पैदा नहीं होने देता। यह अपनापन उन बंधुओं को भी, जो कहीं और चले गए हैं, पुनः वापस लाकर अपनी इस यात्रा के साथ जोड़ने का काम करता है। यही अपनापन हिंदुत्व है, यही राष्ट्रीयत्व है, यही भारतीयत्व है और यही मनुष्यत्व है।

हमें भी यह जानना पड़ेगा, बंधुओं! हमें भी जानने की आवश्यकता है कि हम क्या हैं। यदि हम जानना चाहेंगे, तो जान जाएँगे। आपके इसी कानपुर प्रांत में राजापुर के पास लालापुर है। लालापुर में महर्षि वाल्मीकि आश्रम में जब भगवान राम रहे, तो राम जी को देखते ही महर्षि वाल्मीकि ब्रह्म के रूप में उनकी वंदना करने लगे। राम जी नर-लीला कर रहे थे। महर्षि वाल्मीकि ने यही कहा कि आपको कौन नहीं जान सकता! जो जानना चाहे, वह जान सकता है। इसलिए उन्होंने कहा—

जो जाने सोई देई जनाई, जानत तुम्हहीं तुम्हई होइ जाई।
जाने बिनु न होइ परतीती, बिनु परतीती होय न प्रीती।

जो प्रीति है, वह परस्पर की बात है। प्रीति परस्पर होती है। इसलिए मैं कहता हूँ कि यह समाज हमारा है; हमें प्रीति-परस्पर से आगे बढ़ना पड़ेगा। परस्पर अनुकूल बनना पड़ेगा, संस्कृति-अनुकूल बनना पड़ेगा, देश-अनुकूल बनना पड़ेगा, राष्ट्र-अनुकूल बनना पड़ेगा और मानवता-अनुकूल बनना पड़ेगा।

यह जो सेवा का केंद्र है, वह मानवता-अनुकूलता का एक छोटा सा बिंदु और प्रतिबिंब है। आज समाज के अंदर कितने प्रश्न हैं! हमारे युवा, जिनकी आँखों के सामने राम जैसा बालक है, जो तपस्वी है और पिता की आज्ञा मानता है—

प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥
आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥

आज उस बालक की दिनचर्या क्या हो गई है? उस तरुण की दिशा क्या हो गई है? यद्यपि ज्ञान में वे बहुत आगे हैं, ऊर्जा भी उनके अंदर बहुत है, लेकिन संस्कार की दिशा क्या है? स्वावलंबन के अभाव में यदि सरकारी नौकरी न मिले, तो हम मूर्छित हो जाते हैं कि कहाँ जाएँ; अपना स्टार्टअप खड़ा नहीं कर सकते। जो बालक-बालिकाएँ बड़ों का आदर और अभिवादन करते थे—सब तो ऐसे नहीं हैं, लेकिन बानगी के रूप में आपने अभी दिल्ली में प्रदर्शन (प्रोटेस्ट) के दौरान देखा होगा कि 15 साल की लड़की अपनी आयु से पाँच गुना बड़े भारत के प्रधानमंत्री को कैसे फूहड़ तरीके से गाली दे रही थी! हम उसका वर्णन नहीं कर सकते। यह ‘फ्रीडम’ और ‘चॉइस’ हमें कहाँ ले जाएगी?

शताब्दी वर्ष के एक कार्यक्रम में मुझे लोगों ने बुलाया था। मैं बिसवां जिला गया था, जहाँ छात्र संसद के कई कार्यक्रम थे। उसमें 16 सांसद बनाए गए थे और 16 विषय थे। मुझे भी पाथेय (मार्गदर्शन) देने के लिए बुलाया गया था। विषय बहुत अच्छा था। उसमें से एक बालिका ने ‘नारी स्वावलंबन’ पर बोलते-बोलते कहा, “हमें बराबर का हिस्सा चाहिए, हमें तनिक भी कम नहीं चाहिए” और यह बोलकर बैठ गई। बाद में जब मुझे बोलने के लिए बुलाया गया, तो मैंने यही कहा कि बराबर का हिस्सा माँगने से नहीं मिलेगा। बाकी लोगों ने सोचा कि ऐसा क्यों बोले? तो मैंने उससे कहा, “हिस्सा माँगने से नहीं मिलेगा; तुम छोटी बहन बन जाओगी, तो बराबर क्या, आधे से ज़्यादा हम तुमको देंगे।” 16 सांसदों में से 9 बहनें थीं और 7 बालक सांसद थे। उस विद्यालय की प्रधानाचार्य स्वयं एक बालिका थीं और संसद की अध्यक्षता भी एक बालिका ही कर रही थी। यदि हम विनम्रता के साथ रहेंगे, तो हमें सब मिलेगा। ‘माई फ्रीडम, माई चॉइस’ से काम नहीं चलेगा। हमारी संस्कृति क्या कहती है, उसकी तरफ हमें आगे बढ़ना पड़ेगा। समाज में तमाम प्रश्न हैं, इन प्रश्नों का समाधान कौन करेगा? इन प्रश्नों का समाधान हमें ही करना है।

एक वनवासी क्षेत्र में एक छोटी सी झोपड़ी थी, जिसमें एक बालक रहता था। माँ ने बालक से कहा, “हमारा भाग्य और भविष्य क्या होगा, यह हमें जानना चाहिए।” हर व्यक्ति जानना चाहता है। इसलिए माँ ने कहा, “बेटा, मैंने सुना है कि बहुत दूर मिर्जापुर के सक्तेशगढ़ में एक बाबा बड़े सिद्ध हैं। वे लोगों का भाग्य बताते हैं और प्रश्नों का समाधान करते हैं। तुम वहाँ चले जाओ, तो हमारी आगे की दिशा पता चल जाएगी।” बालक वहाँ से चलता है।

बालक चलते-चलते रात होने पर एक दुकान के बाहर पड़े तख्त पर सो गया। सुबह घर की महिला ने पूछा, “तुम कौन हो और कहाँ जा रहे हो?” बालक ने बताया कि वह अपने प्रश्न का उत्तर ढूँढने जा रहा है। महिला ने कहा, “मेरा भी एक प्रश्न पूछकर आना। मेरी 17-18 साल की बेटी दिव्यांग है, बोलती नहीं है और विवाह भी नहीं हुआ है। वह कब बोलेगी और उसका विवाह कब होगा?” बालक ने कहा, “ठीक है माता जी, पूछ कर आऊँगा।”

आगे दोपहर में वह एक किसान के यहाँ रुका। किसान ने पूछा और अपना प्रश्न दिया, “मेरी कुछ एकड़ ज़मीन में कुछ पैदा नहीं होता। बाबा से पूछना कि इसमें अन्न कब और कैसे पैदा होगा?” बालक आगे बढ़ा। रात में एक आश्रम में रुका, जहाँ एक साधु वर्षों से तपस्या कर रहे थे। साधु ने पूछा, “मैं इतने दिनों से साधना कर रहा हूँ, फिर भी मुझे शांति नहीं मिली। मुझे शांति और सिद्धि कब मिलेगी?”

अगले दिन बालक बाबा के आश्रम पहुँचा। बाबा ने कहा, “तुम केवल तीन प्रश्न पूछ सकते हो, चौथे का उत्तर मैं नहीं दूँगा।” बालक के सामने धर्मसंकट था कि चार प्रश्नों में से कौन से तीन पूछे। उसने सोचा कि यदि अपना प्रश्न पूछूँगा, तो समाज के इन तीन लोगों के दुखों का क्या होगा? उसने अपना प्रश्न छोड़ने का निर्णय लिया और उन तीनों के प्रश्न पूछे।

बाबा ने उत्तर दिए:

1. साधु के लिए: उनके पास एक कीमती मणि है, जिसे बचाने की चिंता में वे बेचैन रहते हैं। उस मणि का त्याग करते ही उन्हें शांति मिल जाएगी।

2. किसान के लिए: ज़मीन के नीचे दबा धन (बर्तन/रत्न) निकालने पर ज़मीन उपजाऊ हो जाएगी।

3. कन्या के लिए: वह जिससे पहली बार बोलेगी, उसी के साथ उसका विवाह होगा।

बालक वापस लौटा। साधु को उत्तर मिला, तो उन्होंने वह मणि बालक को ही दे दी। किसान को उत्तर मिला, तो उसने ज़मीन से निकला धन बालक को सौंप दिया। जब बालक महिला के घर पहुँचा, तो कन्या उसे देखकर जीवन में पहली बार बोल उठी—”आप लोग क्या बात कर रहे हैं?” महिला ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री का विवाह उस बालक से तय कर दिया।

बालक सब कुछ लेकर घर पहुँचा। उसने माँ को पूरी बात बताई कि उसने दूसरों के प्रश्नों के समाधान के लिए अपना प्रश्न छोड़ दिया था। माँ ने कहा, “बेटा, तुमने बिल्कुल सही किया।” दूसरों के प्रश्नों का समाधान करने से बालक को बिना माँगे सब कुछ मिल गया।

ये जो ‘दूसरे’ हैं, वे पराए नहीं हैं, हमारे अपने हैं। इन्हें अपना समझना पड़ेगा।

भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन एक बार नदी किनारे बैठे थे। पानी बह रहा था। अर्जुन ने पूछा, “हम यहाँ क्यों बैठे हैं?” श्रीकृष्ण ने कहा, “मैं नदी का पानी पूरा बह जाने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, ताकि इसे पार कर सकूँ।” अर्जुन ने कहा, “नदी का पानी तो कभी समाप्त नहीं होगा!” तब श्रीकृष्ण ने समझाया कि परिवार और संसार की जिम्मेदारियाँ तथा चुनौतियाँ कभी समाप्त नहीं होंगी; उन्हीं के बीच से हमें मार्ग निकालना होगा।

हमारे पास जो भी ज्ञान, धन, मान, सम्मान और संपत्ति है, हम उसके स्वामी नहीं, बल्कि ‘ट्रस्टी’ (न्यासी) हैं। ट्रस्टी का काम नियोजन करके सेवा करना है। हमारे कंधे पर बैठे चित्रगुप्त हमारा हिसाब (मिनट्स) लिख रहे हैं।

जिन महापुरुष की प्रेरणा से 32 वर्षों से यह सेवा का काम चल रहा है, वे ज्ञान, धन, मान और तपस्या से संपन्न संघ के सिद्ध स्वयंसेवक थे। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी जिम्मेदारी को समझें। जो सेवा कार्य चल रहा है, वह पर्याप्त नहीं है; ऐसे अनेक सेवा केंद्र चलने चाहिए। सेवा तन, मन, धन और वाणी—सभी माध्यमों से की जा सकती है।

जिन महापुरुषों की प्रेरणा से यह कार्य चल रहा है, मैं उन्हें नमन करता हूँ। जिन लोगों ने इस सेवा केंद्र से संस्कार और स्वावलंबन सीखा है, वे अब केवल सेवा लेने वाले न रहें, बल्कि दूसरों को सेवा देने योग्य बनें।

इन शुभकामनाओं के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ—

सेवा है यज्ञ कुंड, समिधा सम हम जले।
ध्येय महासागर में, सरित रूप हम मिले॥

सुभाष जी के उद्बोधन से पहले विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में संस्थान के अध्यक्ष योगेन्द्र नाथ भार्गव, उपाध्यक्ष बी. के. लाहोटी, मंत्री एवं प्रबन्धक आदित्य शंकर वाजपेयी, नीतू सिंह, डॉ. श्याम बाबू गुप्ता, संस्थान के निदेशक डॉ. विवेक सिंह, विद्यालय के प्रधानाचार्य बृजमोहन कुमार सिंह तथा उप-प्रधानाचार्या व केन्द्र संयोजिका मंजूबाला श्रीवास्तव सहित क्षेत्र के अनेक गणमान्य नागरिक, प्रबुद्धजन और स्वयंसेवक उपस्थित रहे।

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